विशेष : हाल ही में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्ताकी ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी, पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार की मेज़बानी की। चीन और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच यहाँ छठा त्रिपक्षीय सम्मेलन हुआ जिसमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) और आतंकवाद समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। इस त्रिपक्षीय बैठक के बाद सीपीईसी को अफ़ग़ानिस्तान तक विस्तारित करने का जो खाका सामने आया है, वह सिर्फ़ एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि एशिया के शक्ति समीकरण को बदलने का एक सुनियोजित खेल है। पाकिस्तान, चीन और अफ़ग़ान तालिबान, इन तीनों देशों के सामने जिन समस्याओं का सामना है, उनमें साझा विकास उतना बड़ा एजेंडा नहीं है जितना कि रणनीतिक पकड़ बढ़ाना।
पाकिस्तान दशकों से अपनी ज़मीन को आतंकवाद फैलाने के लिए अड्डे की तरह इस्तेमाल करता रहा है। लेकिन जब यही ज़हर उसकी रगों में बहने लगा, तो वह अचानक आतंकवाद का शिकार होने का नाटक कर रहा है। हक़ीक़त यह है कि वही पाकिस्तान जिसने तालिबान कबीलों को हथियार और पैसा मुहैया कराया था, अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अफ़ग़ानिस्तान पर आरोप लगा रहा है। यह मगरमच्छ के आंसुओं से ज़्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, चीन का असली एजेंडा अफ़ग़ानिस्तान के साथ-साथ पाकिस्तान में भी अपनी जड़ें जमाना है। चीन “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” के ज़रिए दुनिया को कर्ज़ के जाल में फँसाने में माहिर है। पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह, जो पहले ही बीजिंग की जेब में जा चुका है, अब धीरे-धीरे एक संभावित नौसैनिक अड्डे में तब्दील हो रहा है। सीपीईसी का काबुल तक विस्तार सिर्फ़ एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि बीजिंग के लिए मध्य एशिया में बने रहने का एक स्थायी इंतज़ाम है।
इसलिए अब भारत को समझ लेना चाहिए कि यह कॉरिडोर सिर्फ़ सड़कों और पाइपलाइनों का जाल नहीं, बल्कि ड्रैगन के पंजों का विस्तार है। तालिबान और अस्थिरता की एक नई परत। अफ़ग़ानिस्तान तालिबान के कब्ज़े में है, जहाँ लोकतंत्र नहीं, कट्टरपंथ की सरकार है। ऐसे में वहाँ बुनियादी ढाँचे में निवेश का मतलब है कि चीन ने तालिबान को वैध बनाने का रास्ता चुना है। सवाल उठता है कि क्या दुनिया ऐसे देश को पुरस्कृत करेगी जो महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखता है और लोगों को कठोर शरिया की ज़ंजीरों में जकड़े रखता है? चीन का यह एजेंडा भारत के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी है। सीपीईसी का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। भारत पहले से ही इसके खिलाफ आवाज उठाता रहा है, लेकिन काबुल तक विस्तार का मतलब होगा कि चीन भारत की सीमाओं के आसपास अफगानिस्तान-पाकिस्तान की त्रिकोणीय धुरी को और मजबूत करेगा। ग्वादर से अक्साई चिन तक बन रही “आयरन बेल्ट” सिर्फ सड़कें नहीं, बल्कि भारत के चारों ओर एक सैन्य-रणनीतिक दीवार है।
हालाँकि, मेरा मानना है कि चीन द्वारा काबुल तक सीपीईसी का विस्तार आर्थिक सहयोग से ज़्यादा एक रणनीतिक घेराबंदी है। पाकिस्तान आतंकवाद का रोना रो कर अपनी ज़िम्मेदारी से बचना चाहता है, चीन इस आपदा को अवसर में बदलकर अपने साम्राज्यवादी मंसूबे को आगे बढ़ा रहा है और तालिबान सत्ता को वैध बनाने के लालच में सब कुछ बेचने पर तुला हुआ है। यह भारत के लिए चेतावनी का समय है। हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई करनी होगी। जनता के स्तर पर यह स्पष्ट करना होगा कि सीपीईसी न केवल संप्रभुता का उल्लंघन है, बल्कि एशिया में अस्थिरता भी है। अफगानिस्तान तालिबान के नियंत्रण में है, जहाँ लोकतंत्र नहीं, बल्कि कट्टरपंथ की सरकार है। ऐसे में वहाँ बुनियादी ढाँचे में निवेश का मतलब है कि चीन ने तालिबान को वैध बनाने का रास्ता चुना है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दुनिया उस देश को पुरस्कृत करेगी जो महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखता है और लोगों को सख्त शरिया की ज़ंजीरों में जकड़े रखता है? चीन का यह एजेंडा भारत के लिए खतरे की घंटी है। सीपीईसी का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरता है। भारत पहले से ही इसके खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है, लेकिन काबुल तक विस्तार का मतलब होगा कि चीन-अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान की त्रिकोणीय धुरी भारत की सीमाओं के चारों ओर और मज़बूत हो जाएगी। ग्वादर से अक्साई चिन तक बन रही “आयरन बेल्ट” सिर्फ़ सड़कें नहीं, बल्कि भारत के चारों ओर एक सैन्य-रणनीतिक दीवार है।
वहीं मेरा मानना है कि चीन द्वारा सीपीईसी का काबुल तक विस्तार आर्थिक सहयोग से ज़्यादा एक रणनीतिक घेराव है। पाकिस्तान आतंकवाद का रोना रो कर अपनी ज़िम्मेदारी से बच रहा है। भारत इससे बचना चाहता है, चीन इस आपदा को अवसर में बदलकर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को आगे बढ़ा रहा है और तालिबान सत्ता की वैधता के लालच में सब कुछ बेचने पर तुला हुआ है। यह भारत के लिए चेतावनी का समय है। और यह सैन्यीकृत राजनीति का एक नया बीज है। सीपीईसी अब सिर्फ एक आर्थिक गलियारा नहीं रह गया है, बल्कि चीन का एक रणनीतिक जाल है, जिसे तोड़ने के लिए भारत को अभी से तैयारी करनी होगी।
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